ये मेरे अल्फ़ाज़ कुछ ऐसे हैं जिन्हें पढ़ने के बाद शायद लोग लाइक
करके आगे बढ़ जायेंगे लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी परिंदे होंगे जिनकी उँगलियाँ लाइक बटन
पर होगी लेकिन मन ... किन्ही ख्यालों में
या फिर अतीत की वादियों में ... अतीत को वादी कहने से सायद आप नाराज़ भी हो जाएँ ,
लेकिन इसकी जरुरत नही है दोस्तों ..
अतीत को वादी कहा है मैंने क्यूँकि बेशक उनमे कुछ गम होंगे
लेकिन कुछ खुशियों की याद भी तो होगी....
“ सीखा जाते हैं गम-ए-गफलत भी,
जीने का सलीका कभी –कभी ,
आ जाती है हँसी अकस्मात ही होठों पर
कि कुछ गम भी दे जाते हैं जीने की वजह कभी –कभी ..
यूँ तो होता नही कुछ भी ज़माने में यूँही
कि लबों पर आया हर लफ्ज़ ग़ज़ल बन जाये,
बेपरवाहियों में कही हुई बातें भी
कर जाते हैं घायल ज़ज्बात कभी – कभी...
डूब जाती है सूरज-की गर्मी भी
इन नम आंखो में कभी –कभी,
कि सूख जाते हैं अधर भी
डूब के ग्लास-ए- जाम में कभी...
सीखा जाते हैं गम-ए-गफलत भी,
जीने का सलीका कभी –कभी ,
यूँ बेरुखी न दिखाओ ज़िन्दगी से दोस्त
कि साहिल भी डूब जाते हैं
अरमान – ए-दिल के अशकों में कभी- कभी...”
अर्पणा शर्मा

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