Thursday, 18 January 2018

एक औरत का पहला राजकीय प्रवास

कभी कभी कुछ ऐसी कवितायेँ नज़रों के सामने आ जाती हैं जिन्हें पढने के पश्चात कई बार पढने को आप स्वयं ही बाध्य हो जाते हैं.  आज ये एक ऐसी ही कविता कवयित्री डॉ अनामिका अम्बर जी के कलम से निकली हुयी आप भी पढ़े मेरे साथ...


वह होटल के कमरे में दाखिल हुई!
अपने अकेलेपन से उसने
बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया!
कमरे में अँधेरा था।
घुप्प अँधेरा था कुएँ का
उसके भीतर भी!

सारी दीवारें टटोलीं अँधेरे में,
लेकिन स्विचकहीं नहीं था!
पूरा खुला था दरवाजा,
बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था!
सामने से गुजरा जो बेयरातो
आर्त्तभाव से उसे देखा!
उसने उलझन समझी और
बाहर खड़े-ही-खड़े
दरवाजा बन्द कर दिया!

जैसे ही दरवाजा बन्द हुआ,
बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल!
भला बन्द होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?”
उसने सोचा।
डनलप पर लेटी
चटाई चुभी घर की
अन्दर कहीं-रीढ़ के भीतर!

तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत?
सात गलीचों के भीतर भी
उसको चुभ जाता है
कोई मटरदाना
आदिम स्मृतियों का?

पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था,
पर उसने बाँची टेलिफोन तालिका
और जानना चाहा
अन्तर्राष्ट्रीय दूरभाष का
ठीक-ठाक खर्चा।
फिर अपने सब डॉलर खर्च करके
उसने किए तीन अलग-अलग कॉल!
सबसे पहले अपने बच्चे से कहा
हलो-हलो, बेटे
पैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊँघ गए थे कैसे...
सबसे ज्यादा याद आ रही है तुम्हारी
तुम हो मेरे सबसे प्यारे!

अन्तिम दोनों पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं
ऑफिस में खिन्न बैठ अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से,
फिर चौके में चिन्तित, बर्तन खटकती अपनी माँ से!
...
अब उसकी हुई गिरफ्तारी।

पेशी हुई खुदा के सामने
कि इसी एक जुबाँ से उसने
तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा
सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे!यह तो सरासर धोखा
सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा!
लेकिन ख़ुदा ने कलम रख दी,
और कहा औरत है, उसने यह गलत नहीं कहा।

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