Monday, 22 January 2018

शृंखला --- इतिहास भारत का कहानी -- “कोंडापल्ली किला”

कोंडापल्ली किला जिसे स्थानीय तौर पर कोंडापल्ली कोटा के नाम से भी जाना जाता है भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के दूसरे सबसे बड़े शहर विजयवाड़ा के निकट कृष्णा जिले में स्थित है। पहाड़ियों (पूर्वी ghato) पर बना ये ऐतिहासिक किला कोंडापल्ली गांव के पश्चिम में स्थित है। इस किले का निर्माण 14 वीं शताब्दी के दौरान Kondaveedu के प्रोलाया वेमा रेड्डी ने एक व्यवसाय केंद्र के रूप में करवाया था। 
यहाँ का इलाका केवल किले के लिए ही महशूर नहीं बल्कि यहाँ जो खेल खिलोने मिलते है उनके लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। इस जगह की एक ख़ासियत यह भी है कि कृष्णा जिले में एक कोंडापल्ली संरक्षित जंगल (कोंडापल्ली रिजर्व्ड फ़ॉरेस्ट) भी है जिसकी खूबसूरती को बताया नही जा सकता केवल अनुभव किया जा सकता है.
किले का इतिहास बहुत ही रोमांचक रहा है क्युकी इस किले को अपने कब्जे में रखने के लिए कई बड़े बड़े राजा-महाराजाओं ने कई सालों तक युद्ध किया है. किन्तु किले की मजबूती और सुन्दरता आज भी बनी हुई है. इतने रजा-महाराजाओं के कब्जे में रहने के बाबजूद इसके ढांचे और बनावट में कोई छेड़-छाड़ नही की गयी. आईये डालते है एक नज़र इस किले के इतिहास पर.
कोंडापल्ली किले का स्वर्णिम इतिहास
कोंडापल्ली किले का निर्माण सं 1360 में Kondaveedu के रेड्डी राजवंश के हिन्दू राजा ने करवाया था। निर्माण के कई वर्षो पश्चात तक ये उत्तरी और दक्षिणी भारत के कई शासकों और ब्रिटिशो के मध्य हुए युद्धों का स्थल था। सं 1541 में, मुहमदं ने कोंडापल्ली किले और प्रांत पर कब्ज़ा कर लिया था। कुछ समय के लिए ये किला बहमानी राज्य के कब्जे में था, जिसके पश्चात ओड़िसा के गणपति शासक जिनका अनुगमन विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेवराय कर रहे थे। उसके पश्चात 16 वीं शताब्दी के दौरान इस किले का नियंत्रण कुतुबशाही वंश के मुस्लिम शासकों के हाथो में चला गया।
ओडिसा के गजपति कपिलेंद्र देवा (1435–1466) के पुत्र हामवीरा ने रेड्डियों के खिलाफ युद्ध किया जिसमे वे विजय हुए और सं 1454 में Kondaveedu के पुरे क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। परंतु ओडिसा के सिंहासन के सत्ता के लिए हुए ऐतिहासिक संघर्ष में, हामवीरा ने अपने भाई पुरुषोत्तम के साथ युद्ध किया, जो अपने पिता की मृत्यु की पश्चात उस सिंहासन के उत्तराधिकारी थे। इस युद्ध में उसने बहमानी सुल्तानों से मदद मांगी। सं 1472 में, वो अपने भाई को परास्त करने में सफल रहा और ओडिसा राज्य के सिंहासन पर कब्ज़ा कर लिया। परन्तु एक संधि के अनुसार उसने कोंडापल्ली और राजमुंदरी को बहमानी सुल्तानों को दे दिया। तत्पश्चात, सं 1476 में पुरुषोत्तम ने हामवीरा को परास्त कर ओड़िसा की गद्दी पर कब्ज़ा कर लिया। कहा जाता है सं 1476 में, जब बहमानी राज्य में आकाल पड़ा था कोंडापल्ली में एक क्रांति हुई थी। इसके पश्चात कोंडापल्ली की चौकी के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और इस किले का नियंत्रण हामवीरा को सौंप दिया।
राजा बनने के पश्चात पुरुषोत्तम ने बहमानी सुलतान III से कोंडापल्ली और राजमुंदरी को वापस प्राप्त करने का प्रयास किया। जब उसने राजमुंदरी पर घेरेबंदी की तो किसी अज्ञात कारण के वजह से उसने सुलतान के साथ एक संधि कर ली, जिसके परिणाम स्वरुप विजयनगर और बहमानी शासकों के संबंध ख़राब हो गए। परन्तु सं 1481 में, सुलतान महमद की मृत्यु के पश्चात बहमानी राज्य अव्यवस्थित हो गया। इसका लाभ उठाकर पुरुषोत्तम में सुलतान के पुत्र महमद शाह के साथ युद्ध किया और राजमुंदरी और कोंडापल्ली किले का शासन अपने नियंत्रण में ले लिया। गजपति पुरोषत्तम देवा की मृत्यु सं 1847 में हुई जिसके पश्चात उनके पुत्र गजपति प्रतापरुद्र देवा को उनका उत्तराधिकारी बना दिया गया।
सं 1509 में, गजपति प्रतापरुद्र देवा ने विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेवराय के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया, परन्तु बंगाल के सुलतान अल्लाउद्दीन हुसैन शाह द्वारा किये गये आक्रमण के करें वे पीछे हट गए। इसके परिणाम स्वरुप कृष्णदेवराय ने कोंडापल्ली पर आसानी सी जीत प्राप्त कर ली जिसपर जून 1515 में उन्होंने कब्ज़ा किया था। 1519 में हुए अंतिम युद्ध में कृष्णदेवराय ने पुनः ओड़िसा के शासकों को परास्त कर दिया। किले पर घेरेबंदी करने के तीन माह पश्चात कृष्णदेवराय ने किले का नियंत्रण अपने हाथो में ले लिया। इस युद्ध के पश्चात, कृष्णदेवराय ने गजपति प्रतापरुद्र देवा की पुत्री कलिंग की राजकुमारी जगनमोहिनी से विवाह कर लिया।
विजयनगर के सम्राटों के साथ हुई संधि के पश्चात, सं 1519 से 1525 के मध्य, गजपति प्रतापरुद्र देवा ने अपने क्षेत्र की रक्षा करने के लिए गोलकुंडा के सुलतान, सुलतान कुली क़ुतुब के खिलाफ आक्रमण कर दिया। परन्तु अंत में सं 1531 में, कोंडापल्ली का नियंत्रण गोलकुंडा के सुलतान के हाथो में आ गया था। गोलकुंडा के शासकों के साथ ओड़िसा के साम्राज्य का युद्ध चलता रहा। 1533 में प्रतापरुद्र देवा की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र गोविन्द बिद्याधर, जो ओड़िसा के नए शासक थे ने सुल्तानों के साथ युद्ध किया परन्तु अंत में उन्होंने भी सुल्तानों के साथ एक संधि कर ली।
17 वीं शताब्दी के दौरान ये क्षेत्र मुग़ल शासन के अधीन आ गया। 18 वीं शताब्दी में मुग़ल शासन के विघटन के पश्चात, निज़ाम-उल-मल्लिक, जिन्हे बाद में हैदराबाद का निज़ाम बनाया गया ने स्वतंत्रता की घोषणा की और इस क्षेत्र का नियंत्रण अपने अधिकार लिया। 18 वीं शताब्दी के अंत तक ये स्थान निज़ाम शासकों के ही अधीन था, उसके पश्चात निज़ाम अली और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई एक संधि में इस किले का नियंत्रण अंग्रेजो को सौंप दिया गया। ये संधि 12 नवम्बर 1766 में हुई थी।
दूसरी संधि 1 मार्च 1768 में हुई थी, जिसमे निज़ाम ने ब्रिटिश मुग़ल शासक शाह आलम द्वारा प्रदान किये अनुदान को मानयता दी थी। परन्तु मित्रता के संकेत के रूप में ब्रिटिशो को निज़ाम को 50,000 pounds का भुगतान करना पड़ा।
प्रारंभिक वार्षो में, इस किले का प्रयोग व्यवसायिक केंद्र के रूप में किया जाता था परन्तु 1766 में ब्रिटिशो के इस किले पर कब्ज़ा करने के पश्चात इसे सैन्य प्रशिक्षण स्थल में परिवर्तित कर दिया गया।
किले की संरचना :
ये किला देखने में बहुत ही सुंदर है जिसमे तीन द्वार है। मुख्य प्रवेश द्वार को दरगाह दरवाज़ा के नाम से जाना जाता है जिसका निर्माण ग्रेनाइट के एक ब्लॉक से किया गया है। यह किला 12 feet (3.7 m) चौड़ा और 15 feet (4.6 m) ऊंचा है। इस दरवाज़े का नाम गुलाब शाह की दरगाह के नाम पर रखा गया जिनकी हत्या यहाँ हुए एक युद्ध के दौरान की गयी थी। दरगाह दरवाज़े को छोड़कर एक दूसरा प्रवेश द्वार है जिसे गोलकोंडा दरवाज़े के नाम से जाना जाता है जो पहाड़ी के अन्य छोर पर है, जो जगगैपेट गांव की ओर जाता है। किले की दीवारों में मीनारे और battelment है।
किले के दूर अंत में तनीषा महल है जो दो पहाड़ियों के बीच के शिखर पर स्थित है। इस महल का आकार बहुत ही अच्छा है जिसके भूतल में कई कक्ष है और ऊपरी मंजिल पर एक विशाल कक्ष है। इसके अलावा किले में और भी कई इमारते है जो वर्तमान में खंडहर में परिवर्तित हो चुकी है।
महल के निकट ही एक गहरा जलाशय है। कहा जाता है इस जलाशय का पानी बहुत ठंडा होता है, इतना ठंडा की आपको बुखार भी आ सकता है। किला परिसर में और भी कई छोटे छोटे तालाब है जो गर्मियों के दौरान सुख जाते है। किले के खंडहर में एक अन्न भण्डार है जो जलाशय के पीछे है जहां चमगादड़ निवास करते है।
किला परिसर में एक अंग्रेजी बैराक है जो आज भी मौजूद है, जिसमे आठ विशाल कक्ष है और एक उपभवन है। किले में एक अंग्रेजी कब्रिस्तान भी देखा जा सकता है।





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