उसकी अलमारी बहुत बड़ी थी और तीन दराजों (कम्पार्टमेंट) में बाटी हुयी थी .
बायीं ओर वाली दराज पर्सनल थी , बीच वाली पारिवारिक ( फॅमिली) और दायीं ओर वाली
सामाजिक (सोशल) समझ लीजिये. यह डिवीज़न मंजरी ने ही किया था, उन दिनों जबकि उन दोनो
के बीच भी एक डिवीज़न-लाइन (divider) खिंच गया था.
वह सीधे अलमारी के पास पहुँची. दराज़ों में पड़ी पुस्तकें,
फाइलें,काग़ज-पत्तर सब उसने पलटे, पर वे कागज नही थे. उसे खुद आश्चर्य हो रहा था,
एक झलक-भर में उसने कैसे उन कागजों को ऐसी गहरी पहचान कर ली. उसने झटके से पहली
दराज खोली. उसमे एक-दो इनविटेशन कार्ड थे, ऑफर-लैटर, अपोइन्त्मेन्त लैटर, डायरी,
न्यूज़पपेर कट्टिंग, इलेक्ट्रिसिटी बिल थी. उसने तीसरी दराज खोलीं तो वह न खुली. वह
लॉक थी.
दराज़ लॉक होना कोई अनहोनी बात नही थी,फिर भी वह भीतर तक काँप उठी.
उसने सारा घर छान मारा, पर उसे चाभियाँ नही मिली और तब सचमुच ही उसका सर बुरी तरह
दर्द करने लगा और वह मुंह पर साड़ी का पल्ला डालकर सारे दिन लेटी रही.
उस रात जब वह सोयी तो भीतर-ही-भीतर उसके कुछ घुमड़ता रहा था. रुलाई का
वेग जैसे फूट पड़ना चाहता था, फिर भी उसने सोच लिया था कि वह जबतक सारी बात का पता
नही लगा लेगी तबतक एक शब्द भी नही कहेगी. रोज की तरह ही बिपिन उसके करीब था पर न
जाने क्यूँ, उसने भीतर-ही-भीतर महसूस किया कि उसके साथ सोनेवाला,उसे प्यार करने
वाला बिपिन सम्पूर्ण नही है, केवल एक टुकड़ा है. सम्पूर्ण बिपिन उसे फूल सा हल्का
लगता था लेकिन ये टुकड़ा बिपिन बोझ लग रहा था. बार-बार उसका मन करता कि वह उसी से
साफ़-साफ़ पूछ ले, झगड़ ले, पर दराज़ का लॉक जैसे उसके होठों पर आकर लग गया था. वह
सारी रात कसमसाती रही, पर बोला उससे कुछ भी नही गया था.
औरत की नज़र यों ही बड़ी पैनी होती है, फिर भी उसपर यदि संदेह की सान
चढ़ जाये तो आकाश-पटल चीरने में भी देर नही लगती. दूसरे दिन भी बंद दराज़ उसके सामने
खुली पड़ी थी, जो बिपिन की निहायत निजी और व्यक्तिगत थी. कुछ डायरीयां, एक औरत और
बच्ची की तस्वीरें, लेटर्स. घृणा,क्रोध और दुःख की मिली-जुली भावनाओं का तूफान
उसके मन में उठ रहा था. सर थामकर वह घंटों वहीं बैठी थी. फूट-फूट कर रोती रही. उसे
बराबर लग रहा था कि जिसे धरती समझकर उसने पैर रखा था, वहां शून्य था, कि जैसे वह
एकाएक बेसहारा हो गयी है. उसे अपने घर की छत और दीवारें हिलती नज़र आने लगी थीं.
क्रमशः ( To be continue...)
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