Friday, 23 November 2018

रिश्तेदारी ... तेरी मेरी



                                          चित्र: - साभार गूगल 

घर में साफ़-सफाई और पेंटिंग का काम लगा था और दिवाली के साथ-साथ निशु के पहले बच्चे की डिलीवरी भी नजदीक आ गयी थी.

घर में कामों की भरमार थी और उन्हें करनेवाला कोई नहीं. डेट नजदीक होने के कारण निशु के लिए भरी-भरकम सामान इधर-उधर करना संभव नही था और उसके पति निलेश के पास टाइम नही था.

वैसे तो निलेश बड़े ही शांत स्वभाव का था लेकिन उसके विचार बड़े ही खुले और अपनत्व से परिपूर्ण थे. उसने कभी निशु को अकेलेपन का एहसास नही होने दिया था, बाहर के काम, अपने ऑफिस के काम के साथ ही घर के कामों में भी उसका हाथ बटाता.

जब से उसे पता चला था कि उसके घर भी नन्ही-सी किलकारी गूंजने वाली है, वो ख़ुशी से फुला न समा पा रहा था. अपने परिवार से, अपने रिश्तेदारों से, दोस्तों से, सबसे वह अपनी इस ख़ुशी को बाटता.

जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था उसकी ख़ुशी दोगुनी होती जा रही थी और परेशानी भी. निशु की देख-भाल को लेकर बहुत ही सचेत होता जा रहा था वो. इतने बड़े शहर में अकेले सबकुछ मैनेज करना थोडा कठिन लग रहा था. अब उसे हेल्पिंग हैंड्स की जरुरत महसूस हो रही थी. उसने अपने घरवालो से इस विषय में बात की लेकिन सबके पास कोई न कोई अपना कारण था, किसी ने भी आकर उनके पास रहना अपने लिए कठिन कहा. किसी ने भी उनके पास आने से इंकार नही किया था लेकिन टालम-टाल उनकी बातों में अवश्य ही रहता.

निलेश सबसे बड़े ही सहज भाव से कहता कोई बात नही, वो सब काम भी तो जरुरी है. लेकिन, मन ही मन उसे चिंताए घेर लेती. दूसरी तरफ निशु, सब कुछ देख रही थी, समझ रही थी लेकिन चाह कर भी कुछ बोल नही पाती. निशु अपने मायके से किसी को बुलाने की सोचती फिर ये सोच कर रुक जाती कि कहीं ससुरालवाले बुरा न मान जाएँ. संकोच के कारण चाहते हुए भी वो अपने घर से मदद नही ले पा रही थी.

जब कभी निलेश से इस बारे में बात करना चाहती, निलेश की अपने घर से किसी के आने की उम्मीद देख चुप हो जाती. उसे डर था कि कहीं निलेश उसकी बातों का कोई दूसरा अर्थ न निकाल ले.

निलेश और निशु की शादी को लगभग २ साल होने को आये थे, लेकिन बड़े शहर में रहने के कारण निशु का अपने ससुराल जाना कम ही रहा. इस कारण ससुरालवालों से ठीक से मिलना-जुलना भी नही हो पाया था. न तो उन्हें समझने का समय मिला था और नही उनकी सोच को.

हर दुसरे-तीसरे दिन जब निलेश के घरवालों को फ़ोन करने का सिलसिला बंद होता तो दोनों पति-पत्नी एक दुसरे के आँखों से बातों को समझने का पर्यत्न करते , होठ दोनों के खामोश ही रहते.

वो कहते हैं न, “टाइम flies”. अब सामने दिवाली भी थी और घर में काम भी लगा था. ऊपर से कभी भी लेबर पैन होने की शंका मन में लगी रहती. और देखते ही देखते वो रात भी आ गयी जिसकी सुबह उन दोनों के जीवन में खुशियों का पिटारा ले कर आई थी. अपने हाथों में अपनी परछाई को पाकर निलेश चहक उठा. फिर से सिलसिला शुरु हुआ घरवालों को फ़ोन पर खुशख़बरी देने का.

निलेश ने बड़ी मिन्नतों के साथ कहा था सब से कि वो आये एक बार उसकी “नन्ही परी” को देखने, उसके मासूम से चेहरे पर अपना हाथ फेर उसे आशीर्वाद देने.

बधाइयों का ताता लगा रहता फ़ोन पर लेकिन घर का दरवाज़ा रिश्तेदारों से सुना ही रहा. बच्चे के आने के बाद निशु के परिवार वाले उनसे मिलने आये भी तो उनसे मिलकर कुछ ही दिनों में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने अपने घर को लौट गये. रुकने के लिए न तो निलेश की तरफ से कोई आग्रह हुआ और न ही निशु उन्हें कह पाई. संकोच मन में अब भी था.

बच्चे के आने के साथ ही जिम्मेदारियों का पिटारा बढ़ गया था. निलेश और निशु अब भी एक दुसरे की पूरी मदद करते. लेकिन जो इंतज़ार उन्हें पिछले ३ महीनों से था वही इंतज़ार उनकी ज़िन्दगी में वापस आ गया था, रिश्तेदार तो थे लेकिन उनमे कोई उनका हेल्पिंग हैण्ड बनने को तैयार नही था शायद.

निशु जब भी बच्चे को सँभालने में अपने को अक्षम पाती उसे अपनी माँ याद आती लेकिन चाहते हुए भी न तो वो उन्हें अपने पास रोक पाई थी और न ही उसकी माँ अपनी नवजात नावाशी के पास रुक पाई थी.

निलेश और निशु जब भी अपने बच्चे को देखते उनकी आँखे चमक उठती , उनकी खुशियाँ छलक पड़ती . उन्हें अपना बचपन नज़र आ रहा था और शायद नये सपने आँखों में उतर चुके थे, अब तो बस उनमे रंगों का भरना बाकी था जैसे.

निलेश की आँखों में अब इंतज़ार के साथ साथ निराशा की एक धुंधली सी परछाई नज़र आने लगी थी लेकिन उसके मन में शायद उम्मीद की एक किरण अब भी थी.
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