आज ज़रा फ़ुर्सत पायी थी,
आज उसे फिर याद किया..
बंद गली के आखिरी घर को
खोल के फिर आबाद किया..
खोल के खिड़की चाँद हँसा
फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए, फूल खिलाये,
चिड़ियों को आज़ाद किया..
बड़े बड़े गम खड़े हुए थे
रास्ता रोके राहों में
छोटी छोटी खुशियों से ही
हमने दिल को शाद किया
बात बहुत मामूली सी थी
उलझ गयी तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आखिर
दोनों को बर्बाद किया
दनाओ की बात ना मानी
काम आयी नादानी ही
सुना हवा को, पढ़ा नदी को,
मौसम को उस्ताद किया..
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