कह दो न तुम्ही,
जब देखा था पहली दफा तुमने
कुछ तो बात रही होगी ||
बहती हवाओं में उड़ता,
वो मखमली दुप्पटा मेरा,
बारिश की बूंदों से
भीगी -भीगी मेरी जुल्फे,
नम हथेलिओं में भर कर,
अपनी उगलियों की सुरसुराहट से
जब संवारा था तुमने
कुछ तो बात रही होगी ||
उलझी हुई जुल्फों को
सुलझाते-सुलझाते जब
उलझने लगी थी तुम्हारी निगाहें,
देखा था मैंने
कुछ जाम ख्वाबों के छलक रहे थे,
वो पतली-सी हँसी दबी-दबी सी,
बरबस ही आ गयी थी होठों पर तुम्हारे,
कुछ तो बात रही होगी ||
वो बाँकपन, वो अठखेलियाँ
रंगने लगी थी आफ़ताबी रंगों में,
अपने दरम्याँ जो थी शोखियाँ
लिपटने लगी थी गुलाबी चादर में
कह दो ना एक बार ही सही
कुछ तो बात रही होगी ||
जब देखा था पहली दफा तुमने
कुछ तो बात रही होगी ||
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