Tuesday, 18 December 2018

खो जाता हूँ मैं



खो जाता हूँ मैं खुद में ही कहीं
जब भी देखता हूँ चेहरा तुम्हारा,
सिहर उठता है मेरा रोम-रोम
जब सुनाई देती हैं 
मुझे धड़कने तुम्हारी ||

जब भी देखती हो तुम मुझे,
अपनी पलकों को झपक कर
एक पल को दुनिया भूल जाता हूँ मैं ||

नन्ही-नन्ही उँगलियों से,
जब पकड़ लेती हो 
मेरे मजबूत हाथों को
ऐसा लगता है कोई पेड़
अपनी ही लटों से लिपट-सा गया है ||

तुम तो अभी बिलकुल मासूम हो
तुम्हे तो कुछ भी पता नहीं
फिर भी जब तुम यूँ ही 
कभी-कभी मुस्कुराती हो,
तो मैं सोचता हूँ
तुम मुझे जीवन का
नया पाठ पढ़ाती हो ||

जब से थामा है मैंने तुम्हें
अपनी हथेलियों में,
लगता है मेरी छोटी-सी मुट्ठी में,
मेरी दुनियाँ कैद है ||  

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