Monday, 28 November 2016

अजनबी... जाना –पहचाना सा - III

Hey hello friends, Once again I am here with the same “Love Tree” of BUIE and memories.
चलिए फिर से एक बार चलते हैं बी.ऊ.आई.ई (BUIE) के यादों की वादियों में, एक और कप कड़क चाय की प्याली के साथ. आप भी सोचते होंगे कि इतने दिनों से जिस जगह से, जिस कैंपस से दूर हूँ, उसकी बातें क्यों याद करती हूँ , वही बीती बातों को क्यों दुहराती हूँ... इस सवाल का जवाब तो आप सबको वही दे सकता है जिसने खुद उन गलियों में अपने जीवन के लम्हे गुजारे हों.. वो कहते हैं ना :-
        “ नगमे है, शिकवे है, किस्से है, बाते है..
          बाते भूल जाती है, यादे याद आती है.. “
और ये बिलकुल सच है, कितनी भी दूरी क्यों ना हो... वहाँ की यादें कभी साथ नही छोड़ती.
तो चलो चलते हैं उन हसीं वादियों में ..
दूर दूर तक रेगिस्तान कि तरह फैली लाल बलुई मिट्टी (red sandsoil) और उस रेगिस्तान में हमारा हॉस्टल. कोई नज़र नही आएगा वहाँ सिवाय वहाँ के पंछियों के. चार-पाँच हॉस्टल की  बिल्डिंग और उनका साथ देता हुआ अपना “लव ट्री”, उसी के साथ जुड़ा हुआ एक छोटा सा तालाब “मिरिंडा पोखर“. सबका फेवरेट. पानी हो या न हो, मिरिंडा तो मिरिंडा है. उसका अपना ही नशा है, और वो नशा क्या है ये तो उनसे पूछो जो “ चंडीदास ” और “ आइंस्टीन ” में रहते हैं.
यहाँ रहने वाले लोग अलग अलग ठिकानो से आके यहाँ एक हो जाते हैं. अपने अपने घर-परिवार से दूर एक नया घर बन जाता है, एक नया परिवार मिलता है यहाँ. जो चार सालो के साथ में ही ज़िन्दगी के कई सलीके सिखा जाते हैं. ऐसा किसी एक के साथ नही होता, यहाँ आने वाले हर स्टूडेंट की कहानी ऐसी ही होती है..
जब आते हैं तो नज़रें दौड़ती-भटकती किसी को तलाशती हुई होती हैं, कोई ऐसा जो अपना हमसफ़र बनेगा आनेवाले चार सालों में जो साथ चलेगा. सबकी नज़रे एक छोर से दुसरे छोर तक सिर्फ कुछ नामों को लेकर भटकती है अपने अपने “रूम मेट” की तलाश में. उस खोज कि शुरुआत से लेकर उसके पुरे होने के बीच में कई नये रिश्ते बनते है.. “पडोसी” , ”फ्रॉम सेम प्लेस फ्रेंड्स ”, “ सेम कॉलेज औ’ स्कूल ब्रांच फ्रेंड्स”, “कोचिंग फ्रेंड्स” और न जाने कितने रिश्ते. ये रिश्ते धीरे –धीरे अपने ही रंग में रंगते चले जाते हैं और तब शुरू होता है यादों का एक कारवां .. जो तब नज़र नही आता लेकिन वहाँ से निकलने के बाद, एक दूसरे से दूर होने के बाद यादों के हर पल को अलग ही रंग देते हैं. कभी आँखों में आँसू तो कभी होठों पर मुस्कान दे जाते हैं. हॉस्टल का कैंपस और उसके बीचो-बीच अपना “मिरिंडा पोखर “ उसके ही किनारे पर गर्ल्स हॉस्टल के ठीक सामने हरा-भरा “लव ट्री”. कई यादों का बसेरा होता है यहाँ, कुछ खट्टी तो कुछ मिट्ठी और कुछ ऐसी भी जिनका स्वाद पहचानना थोडा कठिन होता है...
कई रिश्ते होते हैं यहाँ ... भाई-भाई का रिश्ता, बहन-बहन का रिश्ता, भाई-बहन, दोस्ती-यारी और कई रिश्ते तो भाभी-देवर या फिर जीजा-साली के भी बन जाते हैं ... हर रिश्ता बस हँसी-मजाक से, एक दूसरे की परवाह से और अनदेखा सा प्यार से बंधा होता है. दूर-दूर से आये अजनबी “एक रिश्ते में” बंध जाते हैं यहाँ आकर. चार साल के हर दिन की अपनी एक अलग कहानी होती है यहाँ. अगर एक बी.ऊ.आई.इ. से पास आउट बंदा या बंदी ये बोले की उसके लाइफ में जो कुछ भी हो रहा है या हुआ वो एक लम्बी कहानी है... तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नही है.. कहानियां तो हर कॉलेज में होती हैं, लेकिन यहाँ की बात ही अलग है.

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