जैसे-जैसे वक़्त बीतता जाता है रिश्ते गहरे होते जाते हैं, कुछ रिश्ते टूटते भी
हैं और कई नये रिश्ते जुड़ते भी हैं..
“ वक़्त का पैमाना भी अंदाज़-ए-जुदा
होता है यहाँ
कि अपना हर लम्हा अपनों के नाम
होता है..
होती है सुबह दोस्तों-यारों की संगत
में,
कि हर कहानी के पीछे अपना ही एक ज़ाम
होता है..
बन-बिगड़ जाते हैं रिश्ते यहाँ पल
भर में,
लेकिन दिलों में ज़ज्बातों का अम्बार
होता है..
बीत जाते हैं साल-दर-साल यूँ ही,
लेकिन जो न बीत पाए, वो यादें
होती हैं..
घूमता फिरता है हर बंजारा यहाँ
अपनी ही हॉस्टल की गलियों में,
करता है वार्डन की मखनबाजी
रात-बिरात की अन्धेरियों में,
गूंज उठती हैं आवाजें कई यहाँ
दिन-दोपहर रात के अंधेरों में,
कि काफिले निकलते हैं दोस्तों की
टोलियों में..
बीत जाता है वक़्त यूँ ही हँसते- रोते
पर जो न बीत पाती है वो अपनी याद
होती है..”
चार साल में एक वक्त ऐसा भी आता है, जब सबके रास्ते अलग होने लगते हैं. सबकी
किस्मत अलग अलग राहों पर ले जाती है उन अपनों को. लेकिन सिर्फ रस्ते अलग होते हैं,
मन तो वहीँ कॉलेज के लाइब्रेरी में, क्लास रूम में, हॉस्टल के रूम में, कैंपस में,
लव ट्री के पास, मिरिंडा के किनारे, सिबू दा के ढाबे में, दामोदरपुर के चौराहे पर,
राजोग्राम, बाँकुरा और न जाने कहाँ-कहाँ रह जाता है.. अपनी यादों के साथ.
शायद इसलिए आज भी जब कभी लता मंगेशकर
की ये लाइन्स कानो में जाते हैं तो मन अपनी ही यादों की दुनिया में खो जाता है ...
और होठों पर ये लाइन रह जाती है...
“हम भूल गये रे हर बात मगर तेरा प्यार नही
भूले,
क्या
क्या हुआ दिल के साथ -२ मगर तेरा प्यार नही भूले
हम भूल गये रे हर बात मगर तेरा प्यार नही
भूले “
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